प्रेम-पाश

हमारा प्रेम बड़ा महीन होगा
कमज़र्फों का प्रेम नहीं
आशिक़ों का प्रेम नहीं
धनिया और मिर्च सा महकने वाला
आदतों से बाज़ आने वाला
ना छुअन का मोहताज
तर्क से आबाद
तुम्हारी कढ़ाही के बगल
मैं भगोना जलाये रखूँगा
और ये भाषा का विकार
अदृश्य ही रहे तो अच्छा
अक्सर मैं तुम्हे चक्रव्यूह में घेरूं
और तुम शिखण्डी की तरह
शब्द बाण भेदो
पर चूँकि अभी मेरा समय नहीं हुआ है
मैं कुछ देर और तुमसे प्रेम कर सकता हूँ
इतना कि मकान ना डूबे
इतना कि गृहस्थी को चुम्बक न लगें
कमीनों से किये इश्क़
बड़े आमादा होते हैं
कब ऐसे जकड़ लें दोनों को
फिर चंगुल छुड़ाने का नाम ही इश्क़ हो जाए
तुम और हम ज़रा परे ही रहेंगे
इन हृदय-छेदी परपंचों से
पर पेट्रोल न घटे, ये
मैं तुम्हारे जिम्मे छोड़ रहा हूँ
हम दो अंतरिक्ष,
जब अपना ब्रह्माण्ड बनाएंगे
गुलमोहर लगाएंगे और
उम्र छुपाएंगे
वहश के मारे टूट जाएंगे
पुराने किस्सों से मात खाएंगे
तुम ऑडली पोएटिक ही रहना
मैं सब काफिये संभाल रखूँगा

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One thought on “प्रेम-पाश

  1. Bahut hi kamaal likha hai! अक्सर मैं तुम्हे चक्रव्यूह में घेरूं
    और तुम शिखण्डी की तरह
    शब्द बाण भेदो

    Uff! sab kuch. aisa hi aur likhte rahein.

    Like

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