प्लीज़ प्रधानमंत्री

गाओ !
10..9.. 4..3..2
एक सेकण्ड यार!

प्लीज प्रधानमंत्री (ओफ्फो!)
मैं नहीं जाऊँगा (अंतरिक्ष में मत दाग़ो मुझको)
प्लीज प्रधानमंत्री (ओफ्फो!)
मैं नहीं जाऊँगा (अंतरिक्ष में मत दाग़ो मुझको)

पसीने मेरे छूटें जब मैं डालूँ वो सूट
सफ़ेद कंटोपा, परमाणु के बूट
ऊपर गुरुत्वाकर्षण भी नहीं
जीना है मुझे, हीरो बनना नहीं
क्या आवाज़ साफ़ आ रही है?
प्लीज़ प्रधानमंत्री..

मैं हूँ छह फुट का तो बताओ कैसे
पांच फुट के डब्बे में डालोगे?
कहलाऊंगा नहीं सदी का नरेश
जो जल गया करते हुए पुनः प्रवेश
बीवी है मेरी बड़ी तेज़ तर्रार
मोर्चा खोलेगी, चुनाव जाओगे हार
और कौन ले जायेगा चराने मेरी भैंस?

प्लीज़ प्रधानमंत्री..

Translated from “Please Mr. Kennedy“, from the soundtrack of Inside Llewyn Davis



मुलायज़ा फरमाएं।

One day, two years back, while coming out of the bathroom after yet another painful indulgence, I wondered what was wrong with me. Because something definitely was. I googled some traits, from whatever I could understand. The symptoms indicated depression. Took me a year to come to terms with the fact that I was depressed. I also realized around the same time that I was Obsessive Compulsive. A lot of things cleared up that moment. बचपन से depressed होने का शौक़ रहा था, क्यूंकि कभी समझ नहीं आया की साला ये मर्ज़ है क्या! उपरवाले ने ये ख़्वाहिश भी तबीयत से पूरी कर दी. When I went to a psychiatrist, another one year later, over two months back, I was diagnosed with acute depression and anxiety, mild psychotic behaviour with vulnerability to panic disorders. Since then, I’ve been on antidepressants, anxiolytics, clonazepam and anti psychotics. नहीं घबराईये नहीं, this is necessary and pretty basic medication, I’ve been told.

I am product of the same society that thinks depression is the disease that lazy and unfortunate people use to cover their failures up. So I asked my doctor, why was I on medication and how will this cure depression. In layman terms, he said, it is literally a chemical लोचा in the brain. There are three necessary fluids in the brain (नाम google कर लेना बाद में यार!), whose receding or improper secretion causes such mental disorders. These medicines will regulate them fluids. Next question was obviously “what causes this? Why me?”. So, it’s very subjective what can cause this to people. Sensitive ones can also be affected by air pollution, in my case it was several experiences of trauma and the environment I grew up in. I am from a brahmin family in Uttar Pradesh, where people wear their prejudices and repression on their sleeves. We’ve been living in Surat for 16 years now, and it is no better. कहने को most developing city है, पर हर चौराहे पे गधों की भरमार है. ख़ैर, I had graduated with average grades and was at home at the time. One fine day, I told my father that I needed to see a ‘दिमाग का doctor’. He, as a final resort to fix his नालायक son, took me to one. The family became extra caring. Apparently, he instructed my mother “Bhaskar से ज़रा प्यार से बात करो”. So lot of ‘हाँ बेटा’, ‘जी बेटा’, ‘ये चाहिए बेटा?’ etc followed. When I was driving a car one day, father said “बेटा, तुम्हें कोई दिक्कत हो गाड़ी चलाने में तो मुझे बता देना ”. Kafka ने खुद को गोली मार ली होती . A day or two later, in a heated conversation my mother finally spit it out ‘तुम जैसे नाकारे लोग ही दवाईयाँ खाते हैं”.

So , to put it accurately, मुझे “पागल” समझा जा रहा था.

There are innumerable stigmas attached with mental illness, around us. When I first told friends, acquaintences that I was seeing a psychiatrist about depression, reactions varied from a shocked “क्या?” to “ये अचानक depressed कैसे हो गया तू?”. I was told by parents, ‘ किसी को बताना नहीं ’, ‘ये doctor की file कहीं पीछे रख दो आल्मारी में’. It, kind of, made me realize why I was seeing a doctor.

अगर आप सर्दी जुखाम के लिए doctor के पास जा सकते हैं, तो इसके लिए क्यों नहीं ? This is your brain catching cold. Our definitions of “पागल” are very troubling, putting it mildly. In Sunny paaji’s words, “पागल आदमी को दुनिया बनाती है”

But see, I just wanted to talk about it. It’s not something very personal to me, it’s just a disease. Which can be cured. If at any point of time you think you need to see a doctor, just go see them. Talk about it, your problems, wherever you are comfortable. Realization, in these cases, is a big step forward. हिम्मत तो फिर भी आ जाती है.

माँ, बाप, भाई, बहन….कहने दीजिये इन्हे जो कहना है. They’ll understand, or not. Either way, it’s fine.

एक फायदा ये हुआ, since going to a psychiatrist, I identify with mental patients better. Else I was quite ignorant. This has come because of reading up rigorously and having heart wrenching discussions about everything, from my sexual behaviour to traumatizing incidents, which I never talked about with people. अरे there were some I did not even remember.

(Also, I spot mental patients better. दो और मेरे घर में ही हैं .)

All you need is a little empathy and रत्ती भर दिमाग़.

TITLI – उड़ जा रामखिलावन

हमारे यहाँ एक बहुत बड़ा आम का पेड़ है। उसे नवरंगा का पेड़ बोलते हैं, वजह मुझे पता नहीं। वो पेड़ हर साल एक आम के बाग के बराबर आम देता था। कुछ साल पहले हमारे गाँव में जंगली सूअरों का आना शुरू हुआ, गोरखपुर के पास मधुबनी के जंगल काटे जा रहे थे और ये जीव वहाँ से पलायन कर रहे थे। नवरंगा के पेड़ के नीचे बहुत घनी झाड़ियाँ हैं, लगभग 7 फ़ीट ऊँची। अब सूअरों ने उसे अपना डेरा बना लिया, और तबसे हर साल उस पेड़ पर आम होते हैं, कुछ गिरते हैं, पर उन्हें कोई तोड़ने या बटोरने नहीं जाता डर के मारे। न जाने क्यों तितली देखते समय मुझे ये पेड़ बार बार याद आ रहा था, कोई parallel नहीं है सो ढूँढियेगा भी मत।

शायद patriarchy के दलदल में फंसे तितली की किस्मत उस पेड़ पे लगे आमों सी थी, उसे खुद ही कुछ करना पड़ेगा वरना कोई पूछेगा भी नहीं। उसे एक मौका मिलता है इस पेड़ से टूट के गिरने का, पर हर गिरे हुए आम के मुक़्क़द्दर में उठाए जाने का सुख कहाँ? कुछ पैरों तले रौंद भी दिए जाते हैं, या तो फिर वही पड़े रहते हैं, शायद इस उम्मीद में कि कोई उन्हें अंजाम तक पहुंचाएगा या रास्ता दिखा देगा। पर ये बड़े संजोग की बात है, और आप अपने चारों तरफ देखेंगे तो पायेंगे की ऐसे संजोग कम ही होते हैं।

तितली देखते हुए मुझे बार बार LSD याद आ रही थी, उसे भी कनु ने ही लिखा था। वो भी दिल्ली को कुछ ऐसी ही नज़रों से देखती थी। तितली के दो बड़े भाई हैं, जिनके लिए वह एक लताड़ने की चीज़ है। पर उनके दर्द को भी समझना चाहिए, और कनु बहल समझते हैं कि उनके किरदार कहाँ से आये हैं और किन हालात ने उन्हें ऐसा बनाया। यही संवेदना है जो तितली को इतनी बेहतरीन फ़िल्म बनाती है। क्योंकि मेरे हिसाब से एक कहानीकार को अपने किरदारों को समझने के लिए संवेदना बहुत ज़रूरी है, तभी वो उन्हें non judgemental निगाहों से देख पाएंगे।

घर अगर जल भुन रहा हो, उसमे कैसी भी कलह हो कहीं न कहीं मुखिया ही ज़िम्मेदार होता है। यहाँ बड़े भाई विक्रम को ज़िम्मेदारी संभालनी पड़ती है क्योंकि, *Spoiler* जैसा की फ़िल्म में तितली कहता है, पिताजी ‘सूअर’ हैं। विक्रम की ज़िन्दगी देख के तितली सहमा हुआ होगा शायद, या तो बावला की, जिसकी खुद की कोई पहचान नहीं है (अक्सर मंझले भाई ऐसे ही होते हैं)। कई बार ज़िक्र करता है तितली कि वो ‘यहाँ से भागना चाहता है’। मुझे अचंभित किया इस चाह ने। मैं ख़ुद ‘यहाँ’ से निकलना चाहता हूँ। ये जगह मेरे परिवार को जंच गयी, 15 सालों में घर से दूर ये एकलौता शहर है जहाँ हम इतना लंबा टिके हों। पर मुझे तो ये काटने को दौड़ता है। और देखिये, graduate होके मैं फिर यहीं आया हूँ। आप भले ही छोड़ना चाहें, पर शहर आपको इतनी आसानी से नहीं छोड़ते, खासकर जब आपने अपनी आधे से ज़्यादा ज़िन्दगी वहां काटी हो। इसीलिए एक डर ये भी रहता है कि किसी तरह से जो ये शहर छूट भी गया, तो क्या अगला छूट पायेगा?

पर मैं तितली नहीं हूँ, तितली के अंदर बहुत ताक़त है जो वो इतने हाँथ पाँव मार रहा है, छटपटा रहा है, तड़प रह है। और जो आदमी अपने भाइयों को लूटते, मारते, पीटते देखेगा, उसका ऐसा reflex लाज़मी है। मैंने घर को टूटते देखा है, बंटवारे देखे हैं। अब जब वापस गाँव जाता हूँ तो तीन अलग चौकों से खाना आता है, तीन अलग थालियों में। मैं ऐसे में खुद को तितली जैसा बेबस पाता हूँ, क्योंकि अब इन हारे हुए लोगों को समझाना बर्बादी है। एक उम्र के बाद आदमी गलत को सही मानकर उसूलों में ढाल लेता है, विक्रम, बावला, मेरे घरवाले सब ऐसे ही हैं।

तितली को नीलू का मिलना एक poetic justice ही है। नीलू और तितली की भले ही शादी हुई हो, उनमें समझौते का सम्बन्ध है। पर ये दोनों एक दूसरे के राज़दार हैं, एक ऐसा रिश्ता जो सबसे अंतरंग होता है। एक तरह से नीलू तितली की हिम्मत है, जो तितली अक्सर उसपे भी आज़माता है यह दिखाने के लिए की वो मर्द है इस रिश्ते में, जबकि वो बस खुद को भरोसा दिलाना चाहता है कि एक औरत उससे ज़्यादा हिम्मत नहीं रख सकती।  

अगर आप patriarchy को सिर्फ औरतों की तोहमत तक ही सीमित रखेंगे, तो बड़ी नाइंसाफी होगी। हम सब patriarchy के कीड़े हैं। वही से जने हैं, वहीँ कहीं ख़ाक हो जाएंगे। हमारे पितजी, चाचा, मामा, दादा, फूफा सब। बहुत कम लोगों में तितली सी हिम्मत होती है, की उड़ जाएँ।

आज ये लिखते समय मुझे रामखिलावन बड़ा याद आ रहा है। मैं कभी मिला नहीं, कभी देखा नहीं, सिर्फ कहानियों में सुना है उसके बारे में। बावर्ची था गाँव के घर पे, नानी का हाथ बंटाता था। उसके पास ख़ुद की एक toolkit थी जिसमे बेलन, कलछुल, छुरी, छम्मच और कटोरी थी, जिसे किसीने उसे कभी खोलते हुए या इस्तेमाल करते हुए नहीं देखा था। नानी कहती हैं कि उसके हाथ के आलू परवल जो भी खाता था, उसके चेहरे पे सुख देखने लायक होता था। एक रात खाना परोस के रामखिलावन घर से चला गया, किसीने उसे देखा नहीं न तब न तबसे। मुझे शायद पता है वो कहाँ गया होगा।

उड़ जा रामखिलावन
तोरा चौका छूटा जाए
बेलन हांक हांक पहुँच जा
चौका छूटा जाए, रे भोगी!
चम्मच, छूरी, थाल, कटोरी
सब निर्गुण में समाय,
रे तोरा चौका छूटा जाए

PS – एक दिन MAMI में मुझे कनु बहल सामने से आते दिखे। मैं थोड़ा अचंभे में पड़ गया कि क्या कहूँ, क्योंकि मिलना तो था ही। उस वक़्त तक मैंने तितली नहीं देखी थी। तो मैंने कनु से हाथ मिलाया और कहा “क्या ज़बरदस्त फ़िल्म बनायी है आपने, प्लीज अगली फ़िल्म बनाइये जल्दी से”

मैंने कुछ गलत नहीं कहा था, कनु